noor-e-badan se faili andhere mein chandni
kapde jo us ne shab ko utaare palang par
kapde jo us ne shab ko utaare palang par
– Madhav Ram Jauhar
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नूर-ए-बदन से फैली अंधेरे में चाँदनी
कपड़े जो उस ने शब को उतारे पलंग पर
– माधव राम जौहर
नूर-ए-बदन से फैली अंधेरे में चाँदनी
कपड़े जो उस ने शब को उतारे पलंग पर
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रूह को रूह से मिलने नहीं देता है बदन
ख़ैर ये बीच की दीवार गिरा चाहती है
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जी चाहता है हाथ लगा कर भी देख लें
जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई
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याद आते हैं मोजज़े अपने
और उस के बदन का जादू भी
जॉन एलिया
क्या बदन है कि ठहरता ही नहीं आँखों में
बस यही देखता रहता हूँ कि अब क्या होगा
उनके ख़त की आरज़ू है, उनकी आमद का ख़्याल
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता है
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता है
Read moreRahat Indori – Roz Taaron Ko Numaaish Mein Khalal Padta Hai